राष्ट्रीय राजधानी से सटे सूरजकुंड में लगा 24वां विश्व हस्तशिल्प मेला महंगाई की मार का शिकार हो गया है जिसके चलते जहां सैलानी परेशान हैं, वहीं मेले में स्टाल लगाने वाले बहुत से शिल्पी भी निराश हैं।
हरियाणा पर्यटन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि मेले में पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है, वहीं दूसरी ओर मेला प्रबंधन से जुड़े एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि मेले में जबर्दस्त प्रचार प्रसार के बावजूद अपेक्षा के अनुरूप पर्यटक नहीं आ रहे। पर्यटकों की कमी के पीछे महंगाई को कारण माना, क्योंकि इस बार मेले का टिकट 50 रुपये का कर दिया गया है,जबकि पिछले वर्ष यह टिकट 35 रुपये काथा, जिससे किसी व्यक्ति के लिए परिवार के साथ मेला देखना मुश्किल है।
मेले में ज्यादातर भीड़ छात्र-छात्राओं की नजर आती है, क्योंकि उनके लिए प्रवेश नि:शुल्क रखा गया है।
सूरजकुंड मेला देखने आए संजीव कुमार ने कहा कि वह इस बार अपने पूरे परिवार को हस्तशिल्प मेला दिखाना चाहते थे, लेकिन 50 रुपये का टिकट होने के कारण उनकी हिम्मत जवाब दे गई। उन्होंने कहा कि यदिवह अपने परिवार के सभी सात सदस्यों को मेला दिखाने लाते तो उन्हें टिकट के लिए 350 रुपये खर्च करने पड़ते जो उनके वश की बात नहीं।
मेला प्रबंधन से जुड़े अधिकारी ने कहा कि पिछली बार मेले के पहले पांच-छह दिनों में इस बार की तुलना में अधिक सैलानीआए थे, लेकिन इस बार यह संख्या अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। मेले में ऐसे बहुत से व्यक्ति मिल जाएंगे जो टिकट महंगा होने की चर्चा करते नजर आएंगे।
नोडल अधिकारी राजेश जून ने कहा कि अब तक मेले में 60-70 हजार दर्शक आ चुके हैं और रविवार को रिकॉर्डसंख्या में दर्शकों के आने की उम्मीद है। उनके अनुसार यह संख्या पिछली बार के मुकाबले लगभग 10 प्रतिशत अधिक है।
दूसरी ओर, बहुत से हस्तशिल्पी भी महंगाई के जिन्न से निराश हैं। उनका कहना है कि लोग उनके उत्पाद को देखते तो हैं, लेकिन खरीदने केनाम पर आगे खिसक लेते हैं। राजस्थान के एक शिल्पी ने कहा कि वह पर्याप्त बिक्री न होने से परेशान हैं जिससे सूरजकुंड मेला उन्हें फीका नजर आ रहा है। सार्क देशों के स्टालों पर बैठे कई शिल्पियों की भी सामान न बिकने की शिकायत है।
ताजिकिस्तान के एक शिल्पी ने कहा कि मेले में उन्हें भारतीय संस्कृति की रंगीन छटा नजर आ रही है जो मन को सुकून देने वाली है, लेकिनवह अपने सामान की बिक्री के बारे में जो उम्मीद करके आए थे वैसा कुछ नहीं हुआ। लोग उनका सामान देखते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं।